थैलेसीमिया क्या है, कैसे प्रभावित होते हैं छोटे बच्चे और क्या है इसका इलाज : थैलेसीमिया एक बेहद घातक बीमारी है. इस बीमारी के कारण कई ऐसे बच्चे हैं जिनका बचपन कहीं गुम हो जाता है. खून की कमी के कारण बच्चों की जान तक चली जाती है. बच्चे और उनके माता-पिता के लिए एक मात्र उपाय है कि हर 15 दिन में रक्त चढ़ाया जाए. बल्ड मिलना भी बहुत बड़ी चुनौती होती है. हजारीबाग जिले को थैलेसीमिया मुक्त करने के लिए कार्यक्रम का आयोजन किया गया. जिसमें 1000 से अधिक बच्चे और उनके माता-पिता ने हिस्सा लिया.शिविर में थैलेसीमिया संक्रमित बच्चे और उनके भाई-बहन का HLA सैंपल लिया गया. सैंपल मैच कराया जाएगा. जब शत प्रतिशत बोन मैरो मैच कर जाएगा तो थैलेसीमिया पीड़ित बच्चे का बोन मैरो ट्रांसफर किया जाएगा. इस प्रक्रिया में 40 लाख रुपए से अधिक का खर्च होता है. बोन मैरो मैच करने के लिए सैंपल जर्मनी भेजा जाता है. 3 महीने के बाद इसकी रिपोर्ट आती है. रिपोर्ट में शत प्रतिशत मैच कर गया तभी यह प्रक्रिया आगे बढ़ती है.गरीब परिवार के लिए पैसा खर्च करना चुनौती भरा होता है. देश में कुछ संस्था हैं जो पीड़ित बच्चों को आर्थिक सहायता प्रदान करता है. जिसमें नारायणा हेल्थ, मां सेवा समिति, डिकेएमएस प्रमुख है. हजारीबाग वालंटियर ब्लड डोनर संगठन भी महत्वपूर्ण मदद कर रहा है.हजारीबाग शेख भिखारी मेडिकल कॉलेज अस्पताल में आयोजित शिविर में सैकड़ों की संख्या में थैलेसीमिया पीड़ित बच्चे पहुंचे. उनमें से कई ऐसे परिवार भी हैं जिन्होंने इस योजना का लाभ लेकर अपने बच्चों को नई जिंदगी दी है. अभिभावक प्रभु प्रसाद कुशवाह कहना है कि अपने बच्चों को सैकड़ों बार रक्त चढ़ाया. बच्चा हमेशा उदास रहता था. घर में मायूसी थी. बोन मैरो ट्रांसफर होने के बाद बच्चा शत प्रतिशत स्वस्थ है. उन्होंने लोगों से अपील भी किया कि जहां भी इस तरह का शिविर का आयोजन होता है तो अवश्य थैलेसीमिया पीड़ित बच्चे को ले जाकर सैंपल दे और सेवा का लाभ उठाएं.मां सेवा समिति ट्रस्ट के सदस्य भागवत भावेश जो पटना से हजारीबाग पहुंचे हैं. उन्होंने बताया कि थैलेसीमिया मुक्त समाज को बनाने के लिए एक बहुत बड़ी पहल चल रही है. इस शिविर में HLA टेस्ट किया जा रहा है. बच्चों का सैंपल लेकर जर्मनी भेजा जाएगा. शत प्रतिशत अगर सैंपल मैच कर गया तो बच्चा की समस्या हमेशा के लिए समाप्त हो जाएगी. उन्होंने यह भी कहा कि मां-पिता से बोन मैरो मैच होना की संभावना बेहद कम होती है. थैलेसीमिया पीड़ित का उनके भाई-बहन में मैच करने कि संभावना अधिक होती है. अगर परिवार में किसी का मैच नहीं करता है तो एक करोड़ से अधिक लोगों में किसी एक व्यक्ति का बोन मैरो मैच करने की संभावना होती है जो काफी दुर्लभ है. उन्होंने कहा कि एक बेहतर प्रयास हो रहा है, वैसे बच्चे जो 12 साल के उम्र से कम है उनके लिए है.हजारीबाग वालंटियर ब्लड डोनर के निर्मल जैन ने कहा कि इस कैंप में सिर्फ हजारीबाग ही नहीं बल्कि आसपास के जिले के भी कई थैलेसीमिया पीड़ित बच्चे पहुंचे हैं. काफी प्रयास के बाद जिले में पहली बार ऐसा शिविर का आयोजन किया गया है. इनमें कई ऐसे बच्चे हैं जिन्होंने 1000 से अधिक बार खून चढ़ावाया है. थैलेसीमिया पीड़ित बच्चों को उनकी बीमारी से हमेशा के लिए मुक्त कराने कि कोशिश है.

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