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झारखंड राज्यसभा चुनाव: क्या कांग्रेस राजद और वाम दलों को बना रही है बलि का बकरा?

News Pratyaksh | Updated : Fri 19th Jun 2026, 01:21 pm
झारखंड राज्यसभा चुनाव: क्या कांग्रेस राजद और वाम दलों को बना रही है बलि का बकरा?
झारखंड राज्यसभा चुनाव के नतीजों के बाद महागठबंधन के भीतर सियासी हलचल तेज हो गई है। कांग्रेस उम्मीदवार प्रणव झा की हार और निर्दलीय समर्थित उम्मीदवार परिमल नाथवानी की जीत ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं। सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर क्रॉस वोटिंग किसने की और इसके लिए जिम्मेदार कौन है?
राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि कांग्रेस के प्रणव झा और परिमल नाथवानी के बीच 8 वोटों का अंतर रहा। साथ ही खबरें यह भी हैं कि नाथवानी के पक्ष में पड़े दो वोट निरस्त हो गए, जबकि प्रणव झा के खाते का एक वोट रद्द हुआ। यदि इन आंकड़ों को आधार माना जाए तो कम से कम 9 विधायकों द्वारा क्रॉस वोटिंग या अपेक्षित समर्थन न मिलने की संभावना बनती है।
कांग्रेस प्रभारी के. राजू ने सार्वजनिक रूप से राजद और वाम दलों पर सवाल उठाए हैं। लेकिन यदि महागठबंधन के अंकगणित को देखें तो राजद के 4 और वाम दलों के 2 विधायक मिलाकर कुल 6 वोट ही होते हैं। ऐसे में यदि कांग्रेस का दावा सही भी मान लिया जाए, तब भी 3 वोटों का रहस्य बरकरार रहता है। सवाल उठता है कि वे अतिरिक्त वोट आखिर कहां से आए?
यही कारण है कि राजनीतिक विश्लेषकों का एक वर्ग कांग्रेस की रणनीति पर भी सवाल उठा रहा है। क्या वास्तव में राजद और वाम दलों ने धोखा दिया, या फिर कांग्रेस अपनी आंतरिक कमजोरी और संभावित क्रॉस वोटिंग की जिम्मेदारी सहयोगी दलों पर डाल रही है?
इस पूरे घटनाक्रम के पीछे एक और राजनीतिक समीकरण की चर्चा जोरों पर है। झारखंड में लंबे समय से यह चर्चा चल रही है कि मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की पार्टी झामुमो, कांग्रेस के बिना भी सत्ता का गणित साध सकती है। झामुमो के 34 विधायक, राजद के 4, वाम दलों के 2, सरयू राय और जयराम महतो जैसे निर्दलीय समर्थन को जोड़ दिया जाए तो संख्या 42 तक पहुंचती दिखाई देती है, जो बहुमत के आंकड़े के करीब या उससे ऊपर का राजनीतिक प्रभाव पैदा करती है।
इसी संदर्भ में कुछ राजनीतिक पर्यवेक्षक मानते हैं कि कांग्रेस नेतृत्व को भविष्य की संभावनाओं का अंदेशा है। उन्हें डर हो सकता है कि यदि कभी झामुमो कांग्रेस से दूरी बनाने का फैसला करे, तो कांग्रेस के कुछ विधायक भी अलग राह चुन सकते हैं। ऐसे में राजद और वाम दलों पर सार्वजनिक दबाव बनाकर झामुमो और उसके सहयोगियों के बीच अविश्वास पैदा करना कांग्रेस की एक राजनीतिक रणनीति हो सकती है।
हालांकि इस सिद्धांत के समर्थन में कोई प्रत्यक्ष प्रमाण अभी तक सामने नहीं आया है। यह पूरी तरह राजनीतिक विश्लेषण और चर्चाओं पर आधारित दृष्टिकोण है। दूसरी ओर यह भी संभव है कि कांग्रेस वास्तव में सहयोगी दलों से अपेक्षित समर्थन न मिलने से नाराज हो और उसी का इजहार कर रही हो।
फिलहाल राज्यसभा चुनाव का परिणाम महागठबंधन के भीतर भरोसे की कमी को उजागर करता है। असली सवाल यह नहीं है कि दोषी कौन है, बल्कि यह है कि क्या इस चुनाव ने झारखंड की सत्ता में मौजूद गठबंधन के भीतर दरारों को सार्वजनिक कर दिया है?
आने वाले दिनों में यदि कांग्रेस, झामुमो, राजद और वाम दलों के बीच बयानबाजी तेज होती है, तो यह केवल राज्यसभा चुनाव की हार-जीत का मामला नहीं रहेगा, बल्कि झारखंड की भविष्य की राजनीति की दिशा तय करने वाला मुद्दा बन सकता है।