म्यांमार में चल रहे साइबर गुलामी रैकेट से भारतीय नागरिकों को छुड़ाने की कार्रवाई लगातार जारी है
News Pratyaksh | Updated : Mon 24th Nov 2025, 11:27 am
म्यांमार में चल रहे साइबर गुलामी रैकेट से भारतीय नागरिकों को छुड़ाने की कार्रवाई लगातार जारी है. हाल ही में म्यांमार आर्मी ने वहां फंसे 360 भारतीयों को मुक्त कराया जिनमें बिहार के 6 युवक भी शामिल थे. ये सभी मयवादी के के.के. पार्क से छुड़ाए गए. म्यांमार आर्मी ने इन्हें सुरक्षित थाईलैंड भेजा जहां से 18 नवंबर को इन सभी को दिल्ली एयरपोर्ट लाया गया. दिल्ली पहुंचने के बाद आर्थिक अपराध इकाई (EOW) की टीम ने बिहार के युवकों को अपने संरक्षण में लिया और पूछताछ के बाद उन्हें उनके परिजनों को सौंप दिया. इसी समूह में शामिल था गया जिले के डेल्हा निवासी धर्मेंद्र कुमार. पुणे की कंपनियों में काम कर चुके धर्मेंद्र का रोजगार छूट गया था और नई नौकरी की तलाश उन्हें धोखेबाज एजेंटों के जाल में खींच ले गई.धर्मेंद्र बताते हैं-मुझे यकीन नहीं था कि मैं जिंदा बचकर आ पाऊंगा. इंडियन एंबेसी और म्यांमार आर्मी ने हमें मौत से खींचकर बाहर निकाला. उनकी कहानी झकझोर देने वाली है. नौकरी के नाम पर विदेश जाने का सपना कैसे मिनटों में किडनैपिंग, हथियारबंद गिरोह और साइबर गुलामी में बदल गया. धर्मेंद्र बताते हैं कि एक दोस्त ने उन्हें मुजफ्फरपुर निवासी शुभम कुमार से संपर्क करवाया. शुभम ने थाईलैंड में चाइनीज कंपनी में हाई पैकेज जॉब का लालच दिया. ऑनलाइन और वीडियो कॉल के माध्यम से कई इंटरव्यू हुए. अंतिम इंटरव्यू के लिए थाईलैंड बुलाया गया. 19 अक्टूबर को टिकट बना-पटना से कोलकाता और फिर बैंकॉक.20 अक्टूबर को बैंकॉक एयरपोर्ट पर एक ड्राइवर मिला, जिसने धर्मेंद्र को एक फाइव-स्टार होटल में छोड़ा. वहां फिर इंटरव्यू हुआ और सब कुछ प्रोफेशनल और असली लगता रहा. लेकिन इसके बाद जो हुआ उसने धर्मेंद्र की जिंदगी उलट दी. दूसरा ड्राइवर एक चमचमाती कार लेकर आया. धर्मेंद्र को लगा कि अब जॉब मिलने वाला है. कार पहाड़ी रास्तों पर पहुंची, फिर उबड़-खाबड़ इलाके में. अचानक कई हथियारबंद लोग घिर आए और गन प्वाइंट पर किडनैप कर लिया गया.धर्मेंद्र को और 4-5 युवकों को कई घंटे पैदल पहाड़ी रास्ते से ले जाया गया. कई विदेशी दिखने वाले बाइकर रास्ते पर तैनात थे. उन्हें एक गेस्ट हाउस में तीन दिन तक बंद कर दिया गया. बाद में पता चला- वे म्यांमार में घुस चुके थे. यहां उनका असली मकसद सामने आया- उन्हें साइबर गुलामी के लिए अगली जगह ‘बेचा’ जाना था.तीसरे दिन अचानक म्यांमार आर्मी और पुलिस की बड़ी कार्रवाई हुई. धर्मेंद्र और अन्य युवकों को वहां से सुरक्षित निकाल लिया गया. धर्मेंद्र बताते हैं- छापा पड़ने पर हमें लगा कि शायद गोलियां चलेंगी, लेकिन वही हमारी जिंदगी का टर्निंग पॉइंट था. आर्मी ने हमें बचा लिया. छापेमारी के दौरान पुलिस ने वहां पहले से फंसे हुए कई विदेशी नागरिकों-फिलीपींस, नेपाल, बांग्लादेश सहित सभी को भी मुक्त कराया.सभी भारतीयों को पहले म्यांमार में सुरक्षित कैंप में रखा गया. इंडियन एंबेसी के सहयोग से उन्हें थाईलैंड भेजा गया. वहां से 18 नवंबर को दिल्ली एयरलिफ्ट किया गया. आर्थिक अपराध इकाई की टीम ने सभी 6 बिहारी युवकों को पटना लाकर जांच की और परिवारों को सौंप दिया. धर्मेंद्र बताते हैं- अगर देर होती तो हमें दूसरी साइबर कंपनियों को बेच दिया जाता. वहां जो होता वह सोचकर भी डर लगता है.