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भाद्रपद मास की कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को मनाया जाने वाला जितिया व्रत यानी जीवित्पुत्रिका पर्व बिहार की लोक परंपरा में विशेष महत्व रखता है

News Pratyaksh | Updated : Sat 13th Sep 2025, 09:07 am

भाद्रपद मास की कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को मनाया जाने वाला जितिया व्रत यानी जीवित्पुत्रिका पर्व बिहार की लोक परंपरा में विशेष महत्व रखता है. इस साल यह व्रत 13 से 15 सितंबर तक मनाया जाएगा. आज 13 सितंबर को नहाय-खाय, 14 सितंबर को निर्जला उपवास और 15 सितंबर को पारण होगा. बिहार के मिथिला, मगध और कोसी क्षेत्र से लेकर भोजपुरी अंचल तक यह पर्व बड़े श्रद्धाभाव और सामाजिक उत्साह के साथ मनाया जाता है.जितिया मुख्यत माताओं का पर्व है. इसमें माताएं अपने संतान, विशेषकर पुत्रों की दीर्घायु, सुख और समृद्धि के लिए निर्जला व्रत रखती हैं. पटना के प्रसिद्ध ज्योतिषाचार्य पंडित राजन उपाध्याय बताते हैं कि यह व्रत केवल धार्मिक आस्था का नहीं बल्कि मातृत्व की शक्ति और त्याग का प्रतीक है. वे कहते हैं, “जितिया व्रत माताओं के अडिग संकल्प का उत्सव है. इसमें मां अपनी संतान की सुरक्षा और मंगलकामना के लिए स्वयं के कष्ट को सहकर भी भगवान से प्रार्थना करती हैं. इसीलिए इसे जीवित्पुत्रिका कहा गया है.”राजन उपाध्याय के अनुसार जितिया व्रत से जुड़ी कई कथाएं प्रचलित हैं. प्रमुख कथा के अनुसार, महाभारत काल में पांडव पुत्र आभीर जाति के राजा जिमूतवाहन ने अपने जीवन का बलिदान देकर नागकन्या के पुत्र की रक्षा की थी. उनकी त्यागमयी भावना को ही इस व्रत का आधार माना जाता है.पंडित राजन उपाध्याय के अनुसार बिहार में जितिया सिर्फ धार्मिक व्रत नहीं बल्कि सामाजिक उत्सव भी है. इस अवसर पर महिलाएं सामूहिक रूप से नदियों और तालाबों में स्नान करती हैं, एक-दूसरे को जितिया धागा बांधती हैं और लोकगीत गाकर संकल्प को मजबूत करती हैं.