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बिहार की इस मिट्टी में एक पुरानी कहावत है कि यहां धूल सिर्फ उड़ती नहीं, इतिहास भी लिखती

News Pratyaksh | Updated : Tue 04th Nov 2025, 11:25 am
बिहार की इस मिट्टी में एक पुरानी कहावत है कि यहां धूल सिर्फ उड़ती नहीं, इतिहास भी लिखती है...और इसी धूल में खड़े होकर तारतर की सड़क पर लोगों ने फिर से गुजरा हुआ बिहार देखा। उसे देखने और समझने अमर उजाला की टीम भी पहुंची।युवाओं को बिहार में या मोकामा में वह दौर नहीं चाहिए, जब सत्ता की भाषा बंदूकों व कारतूसों से लिखी जाती थी। वोट सिर्फ मत नहीं, ताकत की घोषणा हुआ करते थे। नब्बे के दशक में अखबारों की सुर्खियां...कहीं अपहरण, कहीं नरसंहार, कहीं चुनावी हत्याएं थीं। लालू-राबड़ी शासन और जंगलराज का शब्द उसी समय राजनीतिक शब्दावली में स्थायी जगह ले गया। जहानाबाद की धरती पर नक्सली सेनाएं और प्रतिहिंसक जन्म यानी रणवीर सेना बनी थी। तब यहां की रातें सिर्फ अंधेरी नहीं, बल्कि खौफ से सनी होती थीं। यही वह पृष्ठभूमि थी जिसमें बिहार की राजनीति में बाहुबली अध्याय फूटा। कोई जाति के बुर्ज पर खड़ा होकर ताकत दिखाता था तो कोई अपराध व राजनीति की साझेदारी से साम्राज्य चलाता था। तब चुनाव क्षेत्र नहीं, इलाके कहलाते थे। शासन दिल्ली-पटना से आकार पाती थी, असली कानून स्थानीय सरकार तय करती थी। इन्हीं कहानियों के बीच मोकामा भी एक केंद्र बना
बिहार के सबसे धनवान इलाके मोकामा में राजनीतिक वर्चस्व में हुई हत्या और जदयू प्रत्याशी अनंत सिंह की गिरफ्तारी के बाद मामला पूरे बिहार में गरमाया है। पर, उससे भी महत्वपूर्ण बिंदु है सियासत पर इसका असर क्या है? अब मोकामा का युवा उस दौर को देखना नहीं चाहता, जहां जातीय श्रेष्ठता का बोध या गुटबंदी यहां के आकाश पर अपराध और दहशत की कालिमा लगाने को तैयार हो।