भारत में सितंबर माह में कृषि मजदूरों और ग्रामीण मजदूरों के लिए महंगाई दर में और कमी देखने को मिली है.
News Pratyaksh | Updated : Sat 18th Oct 2025, 12:19 pm
भारत में सितंबर माह में कृषि मजदूरों और ग्रामीण मजदूरों के लिए महंगाई दर में और कमी देखने को मिली है. श्रम और रोजगार मंत्रालय द्वारा शनिवार को जारी आंकड़ों के अनुसार, सितंबर में कृषि मजदूरों के लिए वार्षिक महंगाई दर -0.07 प्रतिशत और ग्रामीण मजदूरों के लिए 0.31 प्रतिशत रही. यह संकेत है कि दोनों वर्गों के लिए उपभोग वस्तुओं की कीमतों में स्थिरता या गिरावट आई है.कृषि मजदूरों के लिए ऑल इंडिया कंज्यूमर प्राइस इंडेक्स (CPI-AL) 0.11 अंक गिरकर 136.23 पर पहुंच गया, जबकि ग्रामीण मजदूरों के लिए (CPI-RL) यह 0.18 अंक की गिरावट के साथ 136.42 रहा. खाद्य वस्तुओं का सूचकांक भी कृषि मजदूरों के लिए 0.47 अंक और ग्रामीण मजदूरों के लिए 0.58 अंक घटा है, जो खाद्य पदार्थों की कीमतों में कमी को दर्शाता है.ये आंकड़े श्रम ब्यूरो द्वारा जारी किए गए हैं और आधार वर्ष 2019=100 पर आधारित हैं. आंकड़ों को देश के 34 राज्यों एवं केंद्र शासित प्रदेशों के 787 नमूना गांवों से एकत्रित किया गया है. यह संशोधित श्रृंखला अब व्यापक दायरे और बेहतर पद्धति के साथ तैयार की गई है, जिससे उपभोक्ता मूल्य सूचकांक की गणना और अधिक विश्वसनीय हुई है.इस संशोधन में उपभोग के पैटर्न में बदलाव के कारण खर्च के अनुपात (वेटिंग डायग्राम) में बदलाव किया गया है. साथ ही, मूल्य में उतार-चढ़ाव को कम करने के लिए ज्यामितीय माध्य (Geometric Mean) का उपयोग किया गया है, जो पारंपरिक अंकगणितीय माध्य (Arithmetic Mean) की तुलना में अधिक स्थिरता प्रदान करता है. इसके अलावा, उपभोग वस्तुओं के वर्गीकरण में COICOP-2018 के अनुसार नवीनतम वर्गीकरण अपनाया गया है.वहीं, थोक मूल्य सूचकांक (WPI) आधारित मुद्रास्फीति दर भी अगस्त के 0.52 प्रतिशत से घटकर सितंबर में 0.13 प्रतिशत रह गई. यह गिरावट संकेत देती है कि थोक स्तर पर भी कीमतों में स्थिरता आई है.देश में उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (CPI) आधारित वार्षिक मुद्रास्फीति सितंबर में 1.54 प्रतिशत पर आ गई है, जो पिछले आठ वर्षों के सबसे निचले स्तर पर है. इसके पीछे खाद्य और ईंधन पदार्थों की कीमतों में गिरावट प्रमुख कारण मानी जा रही है.इस समग्र स्थिति से स्पष्ट होता है कि भारत के ग्रामीण और कृषि मजदूर वर्ग के लिए जीवन यापन की लागत में राहत मिल रही है, जिससे उनकी खरीद क्षमता में सुधार और आर्थिक स्थिरता की संभावना बढ़ रही है. यह आर्थिक संकेतक ग्रामीण भारत में विकास और समृद्धि के लिए सकारात्मक संकेत हैं.